Monday, 12 September 2016

रात को राजा बनते, दिन में पंचर बनाते, कौन हैं ये मल्टीमीडिया लोग!

रात को राजा बनते, दिन में पंचर बनाते, कौन हैं ये मल्टीमीडिया लोग!


hamare gaon mein: village nautanki with all male characters
सन 95-96. रायबरेली जिले का एक गांव. दिसंबर का महीना. साइबेरिया सी सर्दी. बर्फ की जगह ऐसा कोहरा कि आदमी सात रजाई ओढ़ के सोए. खटिया पे मूत ले, उठ के चार कदम जाए न. इसी ठंड में टोटल तिवारी रात में उठे. कहीं कड़ मड़, कड़ मड़ की आवाज सुनाई देती थी. घर की बाउंड्री में लगा बांस का फटका खोला. इत्ता धीरे से कि बगल में सो रहे खंजरू कूकुर को भी खबर न हुई. उसी एहतियात से साइकिल उठाई. चेन उतरी हुई थी. छोटे भाई को चार गाली दी एकदम धीमे से. फिर पैडल पर पांव धरके बिना खट खुट किए निकल गए.

कड़ मड़ वाली आवाज की दिशा में बढ़ते हुए साइकिल की स्पीड काफी तेज हो गई. चार किलोमीटर का रास्ता. मिन्टों की यात्रा सिकंटों में कड्डाली. वहां पंडाल लगा हुआ था. कोहरा इतना गिर चुका था कि पंडाल के बीच में इकट्ठा होकर तेजी से बूंद-बूंद गिरने लगा था. सर्दी में इतनी सर्द बूंद झेलना किसी के बस का नहीं था. तो वहां बीच में भीड़ का गोल फट गया था. बाकी पूरा पंडाल ठस भरा था. रजाई कंबलों के अंदर बिंधे लोग. पंडाल के बाहर भी भीड़ थी. लोग कहीं लकड़ी, कहीं पुआल जलाए बैठे थे घेरकर. लेकिन सबकी नजरें सामने मंच पर थीं. चल रही थी नौटंकी ‘बहन की इज्जत का बदला उर्फ बरसता बादल सिसकती सबनम.’
इत्ती लंबी भूमिका हमने टोटल के करिश्मे के लिए नहीं बांधी. उस नौटंकी के लिए बांधी है, जिसके आशिक कब्र से उखड़कर देखने आ जाते हैं. ऐसा तो क्रेज होता है. वैसी एकाग्रता कभी सिनेमा देखने वालों में न पाओगे. यूपी के गांवों में अब भी नौटंकियां होती हैं. हां, भोजपुरी फिलिम इंडस्ट्री और गाने. मनोज तिवारी, निरहुवा, दिवाकर दुबेदी और गुड्डू रंगीला. इन लोगों ने चाइनीज मोबाइलों के आडियो-वीडियो फोल्डर में कब्जा जरूर किया है. लेकिन देहात की शादियों-बारातों में अब भी नौटंकी होती है. नमूना देख लो. ऐसी होती है.
देखो गुरू अब क्या हुआ है कि पइसा जमके चलता है हर जगह. जो बहुब्बड़े लोग हैं वो महंगे वाले कलाकारों को गाने नाचने के लिए बुला लेते हैं. लेकिन रस तो नौटंकी में है. ऐसा नहीं है कि वो बिना पैसे के हो जाती है. लेकिन उसमें पैसे से ऊपर का रस है. नौटंकी की खास बातें हम आपको यहां बताते हैं.
1. मल्टी टैलेंटेड कलाकार: इनको 13 खाने की रिंच समझो. कई नौटंकियों में लगभग सारे पात्र पुरुष होते हैं. अगर लड़की होती भी है तो आइटम डांस के लिए. लेकिन जो पुरुष कलाकार होते हैं, वो किसी छवि में अटके नहीं होते. अब छवि का मतलब तुम गल्त निकाल रहे हो. हीरो, हिरोइन, विलेन की छवि नहीं. एक्टर की छवि. वो आदमी हीरो बन सकता है, उसकी बहन बन सकता है. नगाड़ा बजा सकता है. हारमोनियम बजा सकता है.
2. नौटंकी कंपनी का मालिक: इस आदमी को सामने से देखो. फिर देखो. इसका नौटंकी में क्या रोल होता है? बुकिंग की पर्ची काटना. सारे एक्टर्स से बात करके जोड़ना. उनका मेहनताना तय करना. तमाम हील-हुज्जत के बाद बात पक्की करना. और नौटंकी के दौरान रात भर छोटी वाली नगाड़ी आग के सामने रखके सेंकना.
3. रात में राजा, दिन में मजदूर: इनके एक्टर्स शौकिया एक्टिंग करते हैं. गांवों के लोवर मिडिल क्लास या मजदूर फैमिली से आने वाले लोग. जिनको कभी-कभी एक्टिंग करने जाना होता है. रोज का रोजगार नहीं है ये. इसलिए रात में दिखेंगे सिंहासन पर राजा बन बैठे हुए. सुबह चौराहे पर अपनी दुकान पर साइकिल-बाइक का पंचर बनाते हुए. इस तरह अपनी जिंदगी के दो रूपों में कमाल करते हैं.
4. एक्शन, इमोशन, ट्रैजिडी: सारी रात का ड्रामा होता है ये. कभी-कभी तो धूप खुलने तक चल जाता है. पुरानी हिंदी फिल्मों की तरह पूरा मसाला. हंसाने के लिए एक जोकर भी होता है. जो अश्लील जोक सुनाने से कतई परहेज नहीं करता.

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